भ्रष्टाचारी

भ्रष्टाचारी  

मेरी  नई कविता का आनंद लीजिये 




हां मैं 

खाता भी हूं,  

गुर्राता भी हूं

मैं हूं एक भ्रष्टाचारी। 

क्या तुम्हें 

जब मौका मिलेगा 

दूसरे की जेब कतरने का 

तुम भी यही नहीं करोगे 

मैं नहीं 

तुम भी तो हो 

मेरे सह  भ्रष्टाचारी। 

दूसरे की संपत्ति 

हम सबको लगती है प्यारी 

वह तो है ही हमारी 

मैं, तुम ही नहीं 

हम सब हैं तन मन धन से महा भ्रष्टाचारी। 

जिसने हमको हटाने का सोचा

 हमने उसी को मिटा दिया। 

हम सबके चेहरे पर हैं एक मुखौटा 

मुझे पता है 

तुम्हें पता है 

कि हम बात नहीं करते 

करते हैं हमारे मुखोटे परस्पर सौदेबाजी, 

हम ही नहीं 

हमारे मुखोटे भी 

अब खेलते हैं 

हमसे लंबी पारी। 

आंखों में आंखें डालो   

मुस्कुराओ और, और बेशर्म बन जाओ 

कोई मरता है तो क्या 

कोई भूखा है तो क्या 

कोई बीमार है तो कराए इलाज अपना 

पुनीत तुम भी क्यों  रहो अछूते 

उठो और गांडीव  नहीं 

इस बार उठाओ बीड़ा 

अपनी जेबों को भरने का 

और खीसें निपोरते  हुए लगाओ नारा -

भ्रष्टाचारी ओ भ्रष्टाचारी 

तू कैसे रह सकता है नाक के नीचे हमारी!



© डॉ पुनीत अग्रवाल 

आगरा  ६ जुलाई २०२१ 


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