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Showing posts from June, 2021

हाय हाय करोना, हाय हाय करोना -- मेरी नयी कविता का आनंद उठाएं

हाय हाय  करोना,  हाय  हाय  करोना   डॉ पुनीत अग्रवाल  मेरी नयी कविता का आनंद उठाएं  २८-६-२०२१  चमकता  हुआ  हो  सूरज  , या रात का चांदना   एक  ही  काम बचा बस  ,नाम  तुम्हारा जपना  सुबह  सुबह जम्हाई, दिन रात उबासी  लेना         हाय  हाय  करोना,  हाय  हाय  करोना। १।  भूले  खाना-पीना, भूले  जोरों से हंसना  मौत को आमंत्रण देने जैसा , लगे खाँसना आओ मिलकर, लगाएं जोरों का धक्का  गो बैक करोना,  यू गो बैक करोना.२।   लेटे-लेटे बिस्तर में,  सिर्फ देखना टीवी  मिला वर्षों बाद,  आनंद पुराना वही  देख देख कर भैया , थक गए अब तो         भागो दूर करोना, तुम भागो दूर करोना।३।   आबाद हो गए,  सूनी  छत और आंगन  देती नयी  फुलवारी, नित्य आनंद सुहाना  गुड़ाई  कर कर, हाथ छिल गए अब  यू  सिली कोरोना, यू पागल ...

सत्य से साक्षात्कार

सत्य से साक्षात्कार अप्रत्याशित नहीं था  तुम्हारा व्यवहार,  उत्तेजित हावभाव,  माथे की सलवटे,  और  मेरे प्रति तुम्हारी उदासीनता।  तुम्हारे अंदर  धधकते- ज्वालामुखी को कर रहा था मैं,  अनुभव।  मेरे पास, मेरी आंखों में  धरोहर थे, वे लम्हे  जो गुजारे थे  हमने साथ साथ..  देखे जा रहा था मैं  एकटक   तुम्हारी ही तरफ  जब तुम मुझसे दूर  चली जा रही थी.  ओझल  होने से पहले  एक बार भी  तुम्हारे पलट के ना देखने ने  मुझे झकझोर दिया।  काश एक बार तो तुम  मुड़के  हौले से पास आकर  मेरी आंखों में समा जाती।  समर्पण कर-  जकड  लेता  तुम्हें जन्म जन्मांतर के लिए.  सत्य से हो जाता  तुम्हारा साक्षात्कार तब  शायद ...............  डॉ पुनीत अग्रवाल  २१-०६-२०२१ 

अपने गांव तक

 दबे पांव, बुद्ध सा   निकल गया घर से,   पैदल, बदहवास-  सुकून की तलाश में.  अपने गांव के  सबसे पुराने   बरगद से जा टकराया  नजरें मिलीं   उसने मुझे छुआ  आंखों आंखों में  पास बैठने को कहा-   अनायास हाथ फैला कर  मैं उससे लिपट गया  ऊबड़ खाबड़  चबूतरे पर  बिखरी चारपाइयां   मेरे स्वागत में बिछ  गई  मुझे थपथपाया और बाहों में भर लिया। पक्षियों का कोलाहल  चटर-पटर  कुलाँचे भरती गौरैया  गिलहरियों का  दबे पांव आना  अचानक उछल जाना  सर सर चलती हवा  फड़फड़ाते  पत्ते  मेरा सारा परिवार  मेरे करीब  सिमट आया. दूर मंदिर में बजती  घंटियां  चरमर चलती बैलगाड़ियां  हाँकता , हाफता  किसान  एक अपना सा शोर  चारों तरफ  सब कुछ जाना पहचाना  कुछ भी अजनबी नहीं।   मैं मानो उबरता  सा  मेरी स्फूर्ति  मेरा सफर  मेरी मंजिल  मेरा समय  मेरा वजूद  बस यही तक...