सत्य से साक्षात्कार

सत्य से साक्षात्कार


अप्रत्याशित नहीं था 

तुम्हारा व्यवहार, 

उत्तेजित हावभाव, 

माथे की सलवटे, 

और 

मेरे प्रति तुम्हारी उदासीनता। 

तुम्हारे अंदर 

धधकते-

ज्वालामुखी को कर रहा था मैं, 

अनुभव। 

मेरे पास, मेरी आंखों में 

धरोहर थे, वे लम्हे 

जो गुजारे थे 

हमने साथ साथ.. 

देखे जा रहा था मैं 

एकटक  

तुम्हारी ही तरफ 

जब तुम मुझसे दूर 

चली जा रही थी. 

ओझल  होने से पहले 

एक बार भी 

तुम्हारे पलट के ना देखने ने 

मुझे झकझोर दिया। 

काश एक बार तो तुम 

मुड़के 

हौले से पास आकर 

मेरी आंखों में समा जाती। 

समर्पण कर- 

जकड  लेता 

तुम्हें जन्म जन्मांतर के लिए. 

सत्य से हो जाता 

तुम्हारा साक्षात्कार तब 

शायद ............... 

डॉ पुनीत अग्रवाल 

२१-०६-२०२१ 

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