अपने गांव तक

 दबे पांव, बुद्ध सा  

निकल गया घर से,  

पैदल, बदहवास- 

सुकून की तलाश में. 

अपने गांव के  सबसे पुराने  

बरगद से जा टकराया 

नजरें मिलीं  

उसने मुझे छुआ 

आंखों आंखों में 

पास बैठने को कहा-  

अनायास हाथ फैला कर 

मैं उससे लिपट गया 

ऊबड़ खाबड़  चबूतरे पर 

बिखरी चारपाइयां  

मेरे स्वागत में बिछ  गई 

मुझे थपथपाया और बाहों में भर लिया।

पक्षियों का कोलाहल 

चटर-पटर 

कुलाँचे भरती गौरैया 

गिलहरियों का 

दबे पांव आना 

अचानक उछल जाना 

सर सर चलती हवा 

फड़फड़ाते  पत्ते 

मेरा सारा परिवार 

मेरे करीब  सिमट आया.

दूर मंदिर में बजती  घंटियां 

चरमर चलती बैलगाड़ियां 

हाँकता , हाफता  किसान 

एक अपना सा शोर  चारों तरफ 

सब कुछ जाना पहचाना 

कुछ भी अजनबी नहीं।  

मैं मानो उबरता  सा 

मेरी स्फूर्ति 

मेरा सफर 

मेरी मंजिल 

मेरा समय 

मेरा वजूद 

बस यही तक 

बस यही तक  

- डॉ पुनीत अग्रवाल 


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  1. Replies
    1. कविता पसंद आने के लिए साभार एवं बहुत-बहुत धन्यवाद

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