पत्र

 बस यूँ ही ....... 

मुझमें सिमट गया, मेरा मन 

लगा फुसफुसाने -

छोड़ो अनमनापन 

सुलझा लो अपनी उलझनें 

बनालो संवाद,

लिख डालो एक पत्र स्वयं को आज। 

मैं ठिठका, सकुचाया 

कुरेदने लगा मस्तिष्क की 

गहराइयों को ,

आती जाती परछाइयों को। 

कभी मौन , कभी उद्धेलित ,

कभी विचार शून्य। 

स्मरण हो आये 

वे कटु क्षण , निष्ठुर पल। 

आते जाते,

विचारों के प्रवाह में ,

लगी कब आँख ,

कब खुल गयी। 

कोरा कागज़ , कोरा ही रहा। 

न जाने कहाँ खो गया,

आँखों से ओझल। 

सोचा फिर, कभी जब 

फुरसत से बैठूंगा ,

शब्दोँ में ढालूँगा ,

सारे शिकवे , शिकायतें। 

शायद, 

जता पाऊँ , सब कुछ ,

बिना कुछ लिखे ही,  तब तक 

शायद.... 


हिंदी कविता -

डॉ पुनीत अग्रवाल 

११ मई २०२१ 




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